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Sudhar kar Jo Bane Sudharak

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Sudhar kar Jo Bane Sudharak

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जब अपराधी को निरन्तर सताया अथवा दुत्कारा जाता है, उसे निन्दनीय मानकर समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, तो वह पहले से भी अध्कि दुष्ट एवं चरित्राहीन होने को बाध्य हो जाता है। यहाँ तक कि उस पर दया करने से भी उसकी कोई विशेष सहायता नहीं होती। उसके आंतरिक घावों पर मलहम लगाने हेतु प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं- उसे समझना, उसकी भावनाओं के प्रति नम्र एवं सम्मानित दृष्टिकोण रखना, हार्दिक रूप से उसकी देखभाल करना! इसके साथ ही, हमें उसके भूतकाल को भूलना और क्षमा करना भी सीखना होगा ताकि वह अपनी नई पहचान बना सके।

प्रत्येक मानव का अन्तरतम हृदय अनिवार्य रूप से दिव्यता-सम्पन्न होता है। यहाँ तक कि बुरे से बुरे व्यक्ति का भी! बस आवश्यकता है इस दिव्यता को अभिव्यक्त करने की, ताकि व्यक्ति अपने इस दिव्य स्वरूप से जुड़कर प्रत्येक स्तर पर दिव्य हो सके। बाहरी साधनों अथवा उपायों के  द्वारा यह अभिव्यक्तिकरण सम्भव नहीं है। ‘ब्रह्मज्ञान’ का उज्ज्वल प्रकाश  ही मानव की इस दिव्यता को प्रदीप्त कर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व को प्रकाशित कर सकता है। पतन की ओर बढ़ते हुए उसके कदमों को ‘ब्रह्मज्ञान’ के माध्यम से ही आध्यात्मिक उन्नति के उच्च मार्ग पर मोड़ा जा सकता है। इस ज्ञान में ही उसे गुणवान व्यक्ति एवं योग्य नागरिक बनाने की सामथ्र्य है।

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Product Description

जब अपराधी को निरन्तर सताया अथवा दुत्कारा जाता है, उसे निन्दनीय मानकर समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, तो वह पहले से भी अध्कि दुष्ट एवं चरित्राहीन होने को बाध्य हो जाता है। यहाँ तक कि उस पर दया करने से भी उसकी कोई विशेष सहायता नहीं होती। उसके आंतरिक घावों पर मलहम लगाने हेतु प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं- उसे समझना, उसकी भावनाओं के प्रति नम्र एवं सम्मानित दृष्टिकोण रखना, हार्दिक रूप से उसकी देखभाल करना! इसके साथ ही, हमें उसके भूतकाल को भूलना और क्षमा करना भी सीखना होगा ताकि वह अपनी नई पहचान बना सके।

प्रत्येक मानव का अन्तरतम हृदय अनिवार्य रूप से दिव्यता-सम्पन्न होता है। यहाँ तक कि बुरे से बुरे व्यक्ति का भी! बस आवश्यकता है इस दिव्यता को अभिव्यक्त करने की, ताकि व्यक्ति अपने इस दिव्य स्वरूप से जुड़कर प्रत्येक स्तर पर दिव्य हो सके। बाहरी साधनों अथवा उपायों के  द्वारा यह अभिव्यक्तिकरण सम्भव नहीं है। ‘ब्रह्मज्ञान’ का उज्ज्वल प्रकाश  ही मानव की इस दिव्यता को प्रदीप्त कर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व को प्रकाशित कर सकता है। पतन की ओर बढ़ते हुए उसके कदमों को ‘ब्रह्मज्ञान’ के माध्यम से ही आध्यात्मिक उन्नति के उच्च मार्ग पर मोड़ा जा सकता है। इस ज्ञान में ही उसे गुणवान व्यक्ति एवं योग्य नागरिक बनाने की सामथ्र्य है।

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