Divya Jyoti Foundation
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  1. Samadhi-Hindi

    Samadhi-Hindi

    Book - Hindi

    समाधि क्या है? जीवन के अनंत प्रवाह में न मृत्यु रूपी अर्ध विराम! न ही ब्रह्म-विलीनता अथवा मोक्ष रूपी पूर्ण विराम! यह तो चेतना का अस्थाई रूप से परमानंद में वास है। सीमित समय के लिए आत्म-तत्त्व का देह से अलगाव है। दिव्य कार्यों की पूर्ति हेतु चेतना की ऊर्ध्व-लोकों में अनित्य यात्रा है। Learn More
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  2. Divya Gyan Prakash (Hindi)

    Divya Gyan Prakash (Hindi)

    Book

    वस्तुतः समस्त जगत एवं व्यक्तिगत सुख-शांति, प्रगति व समृद्धि का एक मात्रा आधर धर्म ही है। मानव में यह तत्त्व समाविष्ट रहे, इसके लिए धर्म का अवलम्बन जरुरी है और धर्मिकता का अवलम्बन कभी घाटे का सौदा नहीं रहा और न रहेगा। मानव जाति की प्रगति धर्म के कारण ही संभव हो सकती है। जब-जब भी मानव धर्म से पिछड़ा, ध्र्म को न समझते हुए अधर्म के मार्ग पर चला। तब-तब मानव जाति का विनाश हुआ। मनुष्य जीवन की स्थिरता धर्मिक सिद्धांतों पर ही टिकी हुई है। अतः समाज का अस्तित्त्व तब ही खतरे में पड़ता है जब उसके पीछे अधर्मिकता और अनैतिकता होती है। किसी भी समय में मानवीय एकता एवं अखंडता के लिए मुख्य जरुरत है धर्म की।

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  3. Shakahaar ya Mansahaar - Kiski Jeet Kiski Haar

    Shakahaar ya Mansahaar - Kiski Jeet Kiski Haar

    Book

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    Rs10.00
  4. Aavahan

    Aavahan

    Book

    आदिकाल से समस्त तत्त्व-ज्ञानियों ने ईश्वर के विषय में एक महत्त्वपूर्ण उद्धोषणा की परामात्मा दर्शन या देखे जाने का विषय है। वह प्रत्यक्ष रूप से अनुभवगम्य है। यह पुस्तक आह्वान। समाज की भ्रांत-धारणाओं को झकझोर कर इसी सनातन उद्धोषणा को उजागर करने के लिए रची गई है। पाठकों से अनुरोध है कि आप स्वयं को पहले की सभी धारणाओं से स्वतंत्र कर ईश्वर के एक सच्चे जिज्ञासु या पिपासु बनकर इस पुस्तक को पढे। इस पुस्तक का एक-एक वक्तव्य प्रामाणिक शास्त्र-ग्रंथों के आधार पर दिया गया है और यही गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी का भी मत है।

    आपके भीतर ईश्वर-दर्शन की प्रबल भावना जगे और आप अपने जीवन के परम लक्ष्य 'ईश्वर-दर्शन' हेतु आगे बढें- यही इस पुस्तक का ध्येय है।

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    Rs50.00
  5. Hum or Hamare .....Shri Ganpati
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  6. Guru Darshan
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  7. Guru Mureed - Sai Bulleshah

    Guru Mureed - Sai Bulleshah

    Book

    बुल्लेशाह- एक ऐसी शख्सीयत है, जो मुरीदी के साँचे में पूरा-पूरा ढला था। जिसने इलाही इश्क के सबसे उँचे शिखर पर अपने प्रेम का झंडा फहराया था। मुर्शिद-प्रेम के गलियारों से गुजरकर खुदा को पाया था। कबीर जी ने कहा है- सुरत कलारी भई मतवारी, मध्वा पी गई बिन तौले। बुल्लेशाह वही है, जो अपने मुर्शिद के प्रेम की मधवा को बिन तौले पी गया था। तभी तो जीवन भर रूहानी इश्क के घुँघरू बांधकर थैया-थैया नाचता रहा- तेरे इश्क नचाया कर थैया-थैया...। उसने अपनी हर सांस, हृदय का हर स्पंदन, रोम-रोम की थिरकन गुरु-प्रेम में कुरबान कर डाली थी। अपना सर्वस्व उनकी जुदाई की आग में हवि कर दिया था। नीर नहीं, नैनों में लहू भरकर वह मुर्शिद के इश्क में दिन-रैन रोया था- मैं लहू नैण भर रोई। Learn More
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  8. Nav varsh kab aur kaise

    Nav varsh kab aur kaise

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    ग्रेगोरियन कैलेंडर में कुछ नौसिखिये पहलू भी दिखाई पड़ते हैं। जैसे कि अर्धरात्रि को 12.00 बजे घुप्प अंधकार के बीच, जब सारी दिनचर्या ठप्प पड़ जाती है- तब ग्रेगोरियन कैलंडर के हिसाब से नया दिन करवट लेता है। आधी रात को तिथि बदल जाती है! पर वहीं दूसरी ओर, भारतीय संवत् के अनुसार हर सुर्योदय के साथ, जब धरा पर नांरगी किरणें बिखरती हैं, तब नया दिन चढ़ता है। माने सूर्यदेव के दर्शन के साथ ही नए दिन का सुस्वागतम्! कहिए, कौन सी बात ज्यादा जंचती है?

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  9. Bhakti Ke Anuthe Rang

    Bhakti Ke Anuthe Rang

    Book

    एक तालाब में मछली, कछुआ, मेंढक, मगरमच्छ आदि बहुत से जल-जीव रहा करते थे। एक बार कुदरत की मार से उस तालाब का जल सूखने लगा। चिंता तो सभी को हुई। पर मछली तो तड़प उठी। fफक्र के मारे बदहवास सी हो चली। किसी ने उससे पूछा- ‘तुझे ही इतनी fफक्र क्यों है? और भी तो हैं! वे तो इतने चिंतित नहीं दिखाई दे रहे!’ मछली ने कहा, ‘अरे भई, वे सभी तो जल के उपभोक्ता हैं। पर मेरे लिए तो जल जीवन है। वे तो यहाँ मौज-मस्ती के लिए आते हैं। इससे जुदा होकर भी जी सकते हैं। पर मैं नहीं! जल तो मेरा प्राण है। यही मेरा ठौर है, यही ठिकाना है।’ एक सच्चे शिष्य की दशा भी एक मछली की तरह हो जाती है, जिसका साईं सबकुछ है। Learn More
    Rs40.00
  10. Har Yug Ki Pukar

    Har Yug Ki Pukar

    Book

    गुरुमुख- तो मनमुख साहब, उपाय सुना आपने? मुनि जी ने कितने स्पष्ट और खरे शब्दों में हम गृहस्थियों को कल्याण का सीधा-सरल रास्ता दर्शाया- संत-संगति यानी पूर्ण गुरु की शरणागति!

    मनमुख (थोड़ा चिढ़कर) - हुँ, पर यह रास्ता इतना सीध और सरल भी नहीं है... खासकर मेरे जैसे के लिए, जिसका मन गुरु-वुरु धरण करने को कतई तैयार नहीं।

    गुरुमुख (स्नेहपूर्वक) -  समझता हूँ! तेरी मनोदशा को मैं भली-भांति पढ़ पा रहा हूँ...तेरे मन को मनाने के लिए ही तो तुझे इस अद्भुत यात्रा पर लेकर आया हूँ...चल, चलते हैं हम अलग-अलग युगों की सैर पर...

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