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Guru Mureed - Sai Bulleshah

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Guru Mureed - Sai Bulleshah

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बुल्लेशाह- एक ऐसी शख्सीयत है, जो मुरीदी के साँचे में पूरा-पूरा ढला था। जिसने इलाही इश्क के सबसे उँचे शिखर पर अपने प्रेम का झंडा फहराया था। मुर्शिद-प्रेम के गलियारों से गुजरकर खुदा को पाया था। कबीर जी ने कहा है- सुरत कलारी भई मतवारी, मध्वा पी गई बिन तौले। बुल्लेशाह वही है, जो अपने मुर्शिद के प्रेम की मधवा को बिन तौले पी गया था। तभी तो जीवन भर रूहानी इश्क के घुँघरू बांधकर थैया-थैया नाचता रहा- तेरे इश्क नचाया कर थैया-थैया...। उसने अपनी हर सांस, हृदय का हर स्पंदन, रोम-रोम की थिरकन गुरु-प्रेम में कुरबान कर डाली थी। अपना सर्वस्व उनकी जुदाई की आग में हवि कर दिया था। नीर नहीं, नैनों में लहू भरकर वह मुर्शिद के इश्क में दिन-रैन रोया था- मैं लहू नैण भर रोई।

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बुल्लेशाह- एक ऐसी शख्सीयत है, जो मुरीदी के साँचे में पूरा-पूरा ढला था। जिसने इलाही इश्क के सबसे उँचे शिखर पर अपने प्रेम का झंडा फहराया था। मुर्शिद-प्रेम के गलियारों से गुजरकर खुदा को पाया था। कबीर जी ने कहा है- सुरत कलारी भई मतवारी, मध्वा पी गई बिन तौले। बुल्लेशाह वही है, जो अपने मुर्शिद के प्रेम की मधवा को बिन तौले पी गया था। तभी तो जीवन भर रूहानी इश्क के घुँघरू बांधकर थैया-थैया नाचता रहा- तेरे इश्क नचाया कर थैया-थैया...। उसने अपनी हर सांस, हृदय का हर स्पंदन, रोम-रोम की थिरकन गुरु-प्रेम में कुरबान कर डाली थी। अपना सर्वस्व उनकी जुदाई की आग में हवि कर दिया था। नीर नहीं, नैनों में लहू भरकर वह मुर्शिद के इश्क में दिन-रैन रोया था- मैं लहू नैण भर रोई।
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